राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर जिले में चोरी के एक मामले की जांच में तांत्रिक (भोपा ) की कथित भूमिका पर गंभीर टिप्पणी करते हुए निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले की जांच भोपी या तांत्रिक के संकेतों के आधार पर नहीं की जा सकती। जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की बेंच ने पुलिस अधीक्षक नागौर को निर्देश दिया कि पुलिस थाना श्री बालाजी में दर्ज एफआईआर की जांच किसी अन्य थाने के सब इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी को सौंपी जाए।
याचिकाकर्ता 80 वर्षीय खेमी देवी की ओर से अधिवक्ता मनोहरसिंह राठौड ने कोर्ट में याचिका दायर कर वर्तमान जांच अधिकारी को बदलने की मांग की थी। याचिका में बताया गया कि 7 मार्च 2026 की रात परिवार के लोग पड़ोस में शादी समारोह में गए हुए थे। इसी दौरान अज्ञात चोर घर के ताले तोड़कर अंदर घुस गए और सोने-चांदी के गहने तथा नकदी चोरी कर ले गए। प्रकरण की जांच हेड कांस्टेबल रतिराम को सौंपी गई थी।
आरोप है कि जांच के दौरान अधिकारी ने परिवादिया से कहा कि चोरी का खुलासा नहीं हो पा रहा है, इसलिए अलवर स्थित एक भोपी के पास चलते हैं, जो चोर का पता बता देगी। इसके बाद जांच अधिकारी गांव के कुछ लोगों और परिवादिया की पुत्रवधु के पिता मोहनराम को साथ लेकर अलवर गया। वहां भोपा ने मेहनताना लेने के बाद मोहनराम को ही चोरी का आरोपी बता दिया। इसके बाद पुलिस ने उसी दिशा में जांच शुरू कर दी।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राठौड़ ने तर्क दिया कि भारतीय कानून में किसी भी अपराध की जांच का आधार भोपा या तांत्रिक नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जांच केवल साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि अंधविश्वास पर।
सुनवाई के दौरान लोक अभियोजक ने भी स्वीकार किया कि जांच अधिकारी अलवर स्थित उस स्थान पर गया था, जहां कथित भोपा रहती है। कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए कहा कि जांच किसी तांत्रिक के प्रभाव से मुक्त होकर निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। इसके बाद हाईकोर्ट ने वर्तमान जांच अधिकारी को बदलने और 15 दिन के भीतर नए अधिकारी को जांच सौंपने के आदेश दिए।
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